पर्वतीय क्षेत्र के कई गांवों को मोबाइल नेटवर्क की तलाश, कहीं ऊंची चोटी तो कहीं पेड़ बनते हैं सहारा

देहरादून। एक ओर देश डिजिटल क्रांति की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी सेवाओं का लाभ लेने की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड के अनेक पर्वतीय गांवों में लोगों के सामने आज भी एक साधारण फोन कॉल करना किसी चुनौती से कम नहीं है। कहीं मोबाइल पर नेटवर्क का संकेत पाने के लिए ग्रामीणों को घर से दूर ऊंची पहाड़ी पर जाना पड़ता है, तो कहीं पेड़ों पर चढ़कर बात करने की कोशिश करनी पड़ती है। कई स्थानों पर लोग अपने घर की छत, खेतों की मेड़ या गांव से बाहर किसी ऐसे स्थान की तलाश करते हैं, जहां मोबाइल की घंटी बज सके और दूसरी ओर बैठे व्यक्ति की आवाज सुनाई दे सके। यह तस्वीर केवल कमजोर मोबाइल संकेतों की कहानी नहीं है, बल्कि उन पहाड़ी परिवारों की परेशानी भी है, जिनके लिए संचार सुविधा आज जरूरत बन चुकी है। मैदानों में मोबाइल फोन जीवन की सामान्य सुविधा है, लेकिन पहाड़ के कुछ दूरस्थ इलाकों में यही फोन लोगों के धैर्य, समय और मेहनत की परीक्षा लेता है। कई जगह ऐसी भी हैं कि गांव में मोबाइल टावर तो लगे हैं लेकिन नेटवर्क न पकड़ने से टावर सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। टिहरी, पौड़ी, रूद्र्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत आदि जिलों के कई दूरस्थ गांवों में यह समस्या बनी है।
कल्पना कीजिए कि किसी परिवार का सदस्य रोजगार के सिलसिले में देहरादून, दिल्ली या देश के किसी दूसरे शहर में रह रहा है। घर में बुजुर्ग माता-पिता हैं, खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी संभाल रहे लोग हैं और स्कूल जाने वाले बच्चे हैं। परिवार का हाल जानने के लिए फोन उठाया जाता है, लेकिन स्क्रीन पर नेटवर्क नहीं है। कई बार फोन लगाने पर कॉल नहीं लगती और कभी बात शुरू होते ही संपर्क टूट जाता है। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों को घर के भीतर बैठे रहने के बजाय बाहर निकलना पड़ता है। कोई खेत की ओर जाता है, कोई गांव के ऊपरी हिस्से में पहुंचता है और कोई पहाड़ी के ऐसे मोड़ पर खड़ा होकर फोन मिलाता है, जहां कभी-कभार संकेत मिल जाता है। कुछ इलाकों में पेड़ों पर चढ़कर मोबाइल चलाने की मजबूरी की तस्वीरें भी सामने आती रही हैं।
जिस फोन को लोगों को अपनों से जोड़ना चाहिए, उसी के लिए उन्हें अपने घर और गांव से दूर जाना पड़ता है। पहाड़ की ढलानों, संकरे रास्तों और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर चलकर नेटवर्क तलाशना ग्रामीणों की दिनचर्या का हिस्सा बन जाए, तो यह व्यवस्था की कमियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पहाड़ के ग्रामीण परिवेश में पेड़ केवल फल, चारा, लकड़ी और छाया देने वाले साधन नहीं हैं। कमजोर मोबाइल संपर्क वाले कुछ स्थानों पर ऊंचाई पर पहुंचने की कोशिश में पेड़ भी नेटवर्क तलाशने का सहारा बन जाते हैं। लोग अधिक ऊंचाई पर पहुंचकर फोन का संकेत पकड़ने की कोशिश करते हैं, ताकि उनकी आवाज दूसरी ओर तक पहुंच सके।
लेकिन यह स्थिति जितनी विचित्र दिखाई देती है, उतनी ही चिंताजनक भी है। पेड़ पर चढ़ना या किसी खड़ी ढलान पर खड़े होकर मोबाइल चलाना जोखिम भरा हो सकता है। बारिश, फिसलन और तेज हवा के बीच यह खतरा और बढ़ जाता है। केवल एक फोन कॉल करने के लिए किसी व्यक्ति को अपनी सुरक्षा दांव पर लगानी पड़े, तो इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सवाल यह भी है कि जब मोबाइल संपर्क जीवन की बुनियादी जरूरत बन चुका है, तब पहाड़ के लोगों को सामान्य संचार सुविधा के लिए ऐसे जोखिम क्यों उठाने पड़ें? सामान्य दिनों में नेटवर्क की परेशानी को लोग किसी तरह झेल लेते हैं। संदेश देर से पहुंचा, फोन नहीं लगा या बातचीत बीच में बंद हो गई, तो कुछ समय बाद दोबारा प्रयास किया जा सकता है। लेकिन आपातकालीन स्थिति में यही परेशानी गंभीर रूप ले सकतीहै। किसी बुजुर्ग की तबीयत अचानक बिगड़ जाए, गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ जाए, खेत या जंगल में काम करने वाला व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो जाए अथवा किसी गांव में आग लग जाए, तो सबसे पहले सहायता के लिए संपर्क करना जरूरी होता है। यदि उस समय फोन नहीं लगे, तो मदद मांगने में देरी हो सकती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में कई गांव स्वास्थ्य केंद्रों, मुख्य सड़कों और बड़े बाजारों से दूर स्थित हैं। ऐसे में समय पर सूचना देना और सहायता बुलाना विशेष महत्व रखता है। कमजोर नेटवर्क हर घटना में संकट पैदा करे, यह जरूरी नहीं, लेकिन जहां संपर्क व्यवस्था भरोसेमंद नहीं है, वहां आपातकालीन जोखिम को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। इसलिए मोबाइल नेटवर्क को केवल मनोरंजन, इंटरनेट या सामाजिक संपर्क की सुविधा मानना उचित नहीं होगा। यह सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा प्रबंधन से भी जुड़ा विषय है।
आज शिक्षा का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों से जुड़ रहा है। ऑनलाइन कक्षाएं, परीक्षा संबंधी सूचनाएं, प्रवेश प्रक्रिया, छात्रवृत्ति के आवेदन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इंटरनेट की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन जहां मोबाइल नेटवर्क स्थिर नहीं है, वहां विद्यार्थियों को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। किसी छात्र को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए घर छोड़कर नेटवर्क वाले स्थान पर जाना पड़े, तो उसका समय और ऊर्जा दोनों खर्च होते हैं। कई बार मौसम खराब होने या अंधेरा होने पर बाहर जाना भी संभव नहीं होता। इससे ग्रामीण और शहरी विद्यार्थियों के बीच उपलब्ध सुविधाओं का अंतर बढ़ सकता है।
रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं के लिए भी यही समस्या बाधा बनती है। नौकरी के आवेदन, साक्षात्कार की सूचना, ऑनलाइन प्रशिक्षण और सरकारी भर्ती से संबंधित जानकारी समय पर प्राप्त करना जरूरी होता है। यदि संपर्क ही भरोसेमंद न हो, तो डिजिटल अवसरों का लाभ उठाना कठिन हो जाता है। डिजिटल इंडिया की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों के पास स्मार्टफोन हैं।

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