देहरादून, 7 नवंबर 2026। विशेष रिपोर्ट। उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता और कलाकारों के रिश्तों की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। राज्य स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित रजत जयंती समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी और अभिनेता हेमंत पांडे को लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया।
दोनों कलाकारों का उत्तराखंड की संस्कृति, लोककला और फिल्म जगत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लेकिन इस सम्मान समारोह ने प्रदेश की राजनीति के कुछ पुराने और चर्चित अध्यायों को भी फिर से चर्चा में ला दिया है।
एक तरफ वह लोकगायक हैं, जिन्होंने भाजपा सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर अपने गीतों से तीखे सवाल उठाए थे। दूसरी तरफ वह अभिनेता हैं, जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी सरकार में उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था।
अब दोनों कलाकारों को भाजपा के शीर्ष नेता अमित शाह के हाथों सम्मानित किए जाने से कला, सत्ता और राजनीतिक विरोध के बदलते समीकरणों पर नई बहस शुरू होने की गुंजाइश है।
कभी भाजपा सरकार पर गूंजा था ‘कमीशन कु मीट-भात, रिश्वत कु रैलू’
उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी अपने गीतों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए जाने जाते हैं।
उनका चर्चित गीत ‘कमीशन कु मीट-भात, रिश्वत कु रैलू’ उत्तराखंड की राजनीति में भ्रष्टाचार-विरोधी व्यंग्य की पहचान बन गया था।
यह गीत उस दौर में विशेष रूप से चर्चा में आया, जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ मुख्यमंत्री थे।
गीत में सरकारी व्यवस्था में कथित कमीशनखोरी, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की संस्कृति पर तीखा व्यंग्य किया गया था।
नरेंद्र सिंह नेगी के इस गीत ने उस समय प्रदेश के राजनीतिक माहौल में व्यापक चर्चा पैदा की थी। इसकी गूंज संसद तक पहुंची और वर्ष 2011 में लोकसभा की कार्यवाही में भी गीत की पंक्तियों का उल्लेख हुआ।
राजनीतिक इतिहास का दिलचस्प संयोग देखिए कि जिस लोकगायक ने भाजपा सरकार के कार्यकाल में व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया था, आज उसी कलाकार को भाजपा सरकार के आयोजन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सम्मानित किया।
हालांकि नरेंद्र सिंह नेगी की राजनीतिक व्यंग्य परंपरा किसी एक दल तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कांग्रेस सरकार के दौर में भी पुष्कर धामी जिनको अपना गुरु मानते है उन एन डी तिवारी पर भी अपने चर्चित गीत ‘नौछमी नरैणा’ के माध्यम से सत्ता और राजनीतिक संस्कृति पर सवाल उठाए थे।
यही उनकी लोकगायकी की विशेषता रही है कि उन्होंने सत्ता में बैठे राजनीतिक दल की परवाह किए बिना सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर अपनी बात रखी।

हेमंत पांडे के सम्मान से फिर याद आया हरीश रावत सरकार का फिल्म बोर्ड विवाद
इस समारोह में अभिनेता हेमंत पांडे को भी लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्रदान किया गया।
हेमंत पांडे हिंदी फिल्मों और टेलीविजन जगत के चर्चित कलाकार हैं। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में उनका नाम वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा गठित उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद के कारण भी चर्चा में आया था।
उस समय मुख्यमंत्री हरीश रावत ने स्वयं परिषद का अध्यक्ष पद संभाला था।
उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया और अभिनेता हेमंत पांडे को परिषद का उपाध्यक्ष नामित किया था।

इसके साथ ही ३ सुपरहिट गढ़वाली गढ़वाली फिल्म निर्माण से जुड़े मनीष वर्मा को परिषद का सदस्य बनाया गया था।
लेकिन परिषद के गठन के तुरंत बाद ही नियुक्तियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
मनीष वर्मा ने ठुकराई थी सदस्यता, वरिष्ठता और पद की गरिमा पर उठाए थे सवाल
वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा गठित उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद में सदस्य नामित किए जाने के बाद मनीष वर्मा ने पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
मनीष वर्मा ने अपनी नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि वह पूर्व में मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। और वर्तमान में भाजपा सरकार में है
ऐसे में उन्हें सामान्य सदस्य बनाकर तिग्मांशु धूलिया और हेमंत पांडे के अधीन रखना उनकी पूर्व प्रशासनिक वरिष्ठता और पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने इसी आधार पर परिषद की सदस्यता ठुकरा दी थी।
यह विवाद उस समय मीडिया में भी प्रमुखता से सामने आया था।
27 अगस्त 2016 को प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में उत्तराखंड फिल्म परिषद के गठन के बाद उत्पन्न विवाद और नियुक्तियों को लेकर असहमति का उल्लेख किया गया था।
इस घटनाक्रम ने तत्कालीन हरीश रावत सरकार की फिल्म परिषद के गठन और पदों के निर्धारण की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे।
मनीष वर्मा के बाद तिग्मांशु धूलिया ने भी उपाध्यक्ष पद लेने से किया इनकार
फिल्म विकास परिषद का विवाद केवल मनीष वर्मा के पद ठुकराने तक सीमित नहीं रहा।
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने भी परिषद के उपाध्यक्ष का पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, धूलिया ने राज्य सरकार को पत्र भेजकर शिष्टाचार और नैतिकता के आधार पर मनीष वर्मा के समर्थन में अपनी नियुक्ति वापस लेने का अनुरोध किया था।
उस समय उनकी नियुक्ति को लेकर सार्वजनिक जीवन में पदों की स्वीकार्यता और संभावित हितों के टकराव से जुड़े सवाल भी उठे थे।
हालांकि धूलिया ने उत्तराखंड के फिल्म उद्योग के विकास में अपना सहयोग जारी रखने की बात कही थी।
इस प्रकार जिस फिल्म परिषद को प्रदेश के फिल्म उद्योग के विकास के लिए महत्वपूर्ण पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह अपने गठन के शुरुआती दौर में ही विवादों में घिर गई।
एक तरफ मनीष वर्मा ने सदस्यता ठुकराई और दूसरी तरफ तिग्मांशु धूलिया ने उपाध्यक्ष पद लेने से इनकार कर दिया।
यह घटनाक्रम तत्कालीन हरीश रावत सरकार के लिए प्रशासनिक और राजनीतिक असहजता का विषय बन गया था।
हरीश रावत ने बनाया था उपाध्यक्ष, अब भाजपा सरकार ने किया सम्मानित
वर्ष 2016 के इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अभिनेता हेमंत पांडे की नियुक्ति भी थी।
हरीश रावत सरकार ने उन्हें उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद का उपाध्यक्ष नामित किया था।
अब लगभग एक दशक बाद हेमंत पांडे को भाजपा सरकार के राज्योत्सव समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हाथों लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्रदान किया गया है।
यह घटनाक्रम उत्तराखंड में कलाकारों और राजनीतिक सत्ता के बीच बदलते संबंधों को समझने का अवसर देता है।
हालांकि किसी सरकार द्वारा किसी कलाकार को परिषद का पद देना या सम्मानित करना अपने आप में उस कलाकार की किसी राजनीतिक दल के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
फिर भी सवाल उठता है कि उत्तराखंड में फिल्म परिषद के गठन, कलाकारों की नियुक्ति और सम्मान के लिए राजनीतिक मतभेदों से अलग कितनी स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था विकसित की गई है?
अमित शाह के सामने उत्तराखंड की राजनीति का दिलचस्प इतिहास
राज्योत्सव समारोह में अमित शाह ने उत्तराखंड के विकास और पूर्ववर्ती सरकारों की कार्यशैली को लेकर अपने विचार रखे।
इसी मंच पर नरेंद्र सिंह नेगी और हेमंत पांडे का सम्मान प्रदेश के राजनीतिक इतिहास के दो अलग-अलग प्रसंगों को जोड़ता दिखाई देता है।
नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के शासनकाल में सत्ता पर सवाल उठाए।
वहीं हेमंत पांडे वर्ष 2016 में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार द्वारा गठित फिल्म विकास परिषद में उपाध्यक्ष नामित किए गए थे।
उसी परिषद में पदों की वरिष्ठता को लेकर मनीष वर्मा ने सदस्यता ठुकराई थी और तिग्मांशु धूलिया ने भी उपाध्यक्ष पद लेने से इनकार किया था।
अब भाजपा सरकार के आयोजन में दोनों कलाकारों को मिला सम्मान यह प्रश्न सामने लाता है कि राज्य सरकारों को सांस्कृतिक उपलब्धियों, राजनीतिक आलोचना और प्रशासनिक नियुक्तियों के बीच किस प्रकार संतुलन बनाना चाहिए।
क्या भाजपा ने कलाकारों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखकर दिया सम्मान?
इस पूरे घटनाक्रम का एक सकारात्मक पक्ष भी है।
यदि नरेंद्र सिंह नेगी जैसे सत्ता की आलोचना करने वाले लोकगायक को सरकार सम्मानित करती है, तो इसे कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति सम्मान के रूप में देखा जा सकता है।
इसी प्रकार हेमंत पांडे का पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में फिल्म परिषद का पदाधिकारी नामित होना उनके वर्तमान सांस्कृतिक योगदान को कम नहीं करता।
लेकिन वर्ष 2016 में फिल्म विकास परिषद को लेकर उठे विवाद आज भी कुछ महत्वपूर्ण सवाल छोड़ते हैं।
क्या परिषद में नियुक्तियों के लिए वरिष्ठता, अनुभव और क्षेत्रीय फिल्म उद्योग में योगदान के स्पष्ट मानदंड निर्धारित किए गए थे?
क्या तत्कालीन विवादों के बाद फिल्म परिषद की कार्यप्रणाली में सुधार हुआ?
और क्या राज्य के सांस्कृतिक पुरस्कारों के चयन में ऐसी पारदर्शिता है जिससे कलाकारों के योगदान का आकलन राजनीतिक संबंधों से स्वतंत्र रूप से किया जा सके?
इन सवालों का जवाब उत्तराखंड के फिल्म और सांस्कृतिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
सम्मान से ज्यादा चर्चा में आए पुराने राजनीतिक प्रसंग
उत्तराखंड में कलाकारों का सम्मान एक स्वागतयोग्य सांस्कृतिक अवसर है, लेकिन राज्य का राजनीतिक इतिहास कई बार ऐसे आयोजनों को व्यापक सार्वजनिक विमर्श का विषय बना देता है।
नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में व्यक्त भ्रष्टाचार-विरोधी स्वर और हेमंत पांडे की हरीश रावत सरकार के फिल्म विकास परिषद में नियुक्ति दो अलग-अलग ऐतिहासिक तथ्य हैं।
इन दोनों को जोड़कर किसी कलाकार की राजनीतिक निष्ठा निर्धारित करना उचित नहीं होगा।
इसके बजाय यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि प्रदेश में सरकारें राजनीतिक आलोचना करने वाले कलाकारों और पूर्ववर्ती सरकारों के साथ काम कर चुके सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के प्रति किस प्रकार का व्यवहार अपनाती हैं।
उत्तराखंड की राजनीति का यही दिलचस्प पहलू है—सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, लेकिन कलाकारों के योगदान और उनके पुराने राजनीतिक प्रसंग सार्वजनिक स्मृति में बने रहते हैं।
सवाल
क्या उत्तराखंड में कलाकारों के सम्मान और फिल्म संस्थाओं में नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी तरह राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र होनी चाहिए?
और क्या वर्ष 2016 में फिल्म विकास परिषद के गठन के समय उठे विवादों की समीक्षा कर राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि भविष्य में सांस्कृतिक संस्थाओं के पदाधिकारियों और पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं का चयन किन मानदंडों पर किया जाएगा?
क्या उत्तराखंडी फिल्मों को निर्माण करने वाले और यहाँ की बोली भाषा संस्कृति और मूल निवासी को महत्व मिलेगा ?
इन सवालों पर सरकार और सांस्कृतिक जगत, दोनों का पक्ष महत्वपूर्ण है। बहरहाल, यह खबर भाजपा के अंदरूनी गुटो एवं जनता में चर्चा का विषय बनी हुई है।
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