नई दिल्ली: भारत अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम चरण में पहुँच गई है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच करीब 18 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ (पारस्परिक शुल्क) लागू किए जाने की संभावना है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह व्यापार समझौता मार्च के मध्य तक औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित किया जा सकता है। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार को संतुलित बनाना और आयात-निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।
यह समझौता कृषि उत्पादों, औद्योगिक वस्तुओं, टेक्नोलॉजी उपकरणों और सेवाओं के क्षेत्र में व्यापार को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे दोनों देशों की कंपनियों को नए बाज़ारों तक पहुँच मिलेगी।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “यह समझौता भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करेगा। हम चाहते हैं कि व्यापार दोनों पक्षों के लिए लाभकारी हो।”
वहीं, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय से जुड़े एक अधिकारी ने बयान दिया, “हम भारत के साथ निष्पक्ष और पारदर्शी व्यापार प्रणाली को बढ़ावा देना चाहते हैं। यह समझौता उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
विशेषज्ञों के अनुसार, 18 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ से कुछ क्षेत्रों में लागत बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में इससे घरेलू उद्योगों को संरक्षण और प्रतिस्पर्धा दोनों मिलेगी। खासकर ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा सेक्टर पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
व्यापार विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता भारत की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भूमिका को और मजबूत करेगा। साथ ही, विदेशी निवेश को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालांकि, कुछ कारोबारी संगठनों ने चिंता जताई है कि बढ़े हुए शुल्क से छोटे और मध्यम उद्यमों पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि प्रभावित क्षेत्रों के लिए सहायक नीतियाँ बनाई जाएंगी।
फिलहाल, दोनों देशों की टीमें अंतिम दस्तावेज़ पर काम कर रही हैं। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह समझौता भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को किस दिशा में आगे ले जाता है।