अमेरिकी सांसदों ने भारत पर

वाशिंगटन/नई दिल्ली — वर्तमान वैश्विक व्यापार विमर्श में एक आश्चर्यजनक बदलाव देखा गया है। जहाँ दुनिया भर के देश मुख्य रूप से आने वाले अमेरिकी शुल्कों के प्रभाव को कम करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका की सीनेट के भीतर एक शक्तिशाली गुट मांग कर रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नई दिल्ली के प्रति अधिक आक्रामक रुख अपनाएं। मोंटाना के रिपब्लिकन सीनेटर स्टीव डेंस और नॉर्थ डकोटा के केविन क्रेमर ने औपचारिक रूप से राष्ट्रपति से याचिका की है कि वे अमेरिकी दलहन फसलों—विशेष रूप से पीली मटर—पर भारत के “अनुचित” टैरिफ में कटौती को प्राथमिकता दें। उन्होंने इसे 2026 में किसी भी व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए एक अनिवार्य शर्त के रूप में रखने का सुझाव दिया है।

16 जनवरी, 2026 को एक संयुक्त पत्र में रेखांकित यह अनुरोध अमेरिकी मिडवेस्ट (Midwest) में बढ़ते घरेलू संकट को उजागर करता है। जबकि वैश्विक समुदाय “ट्रंप 2.0” प्रशासन द्वारा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं पर 25-50% तक के व्यापक टैरिफ लगाए जाने को देख रहा है, इन सीनेटरों का तर्क है कि अमेरिकी किसान पहले से ही अपने सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक—भारत—द्वारा खड़ी की गई संरक्षणवादी बाधाओं के कारण नुकसान झेल रहे हैं।

‘पीली मटर’ का विरोधाभास

विवाद की जड़ भारत के राजस्व विभाग द्वारा 1 नवंबर, 2025 को फिर से लागू किया गया 30% आयात शुल्क है। इस कदम ने पीली मटर के लिए शुल्क-मुक्त पहुँच की उस महत्वपूर्ण अवधि को अचानक समाप्त कर दिया, जिसे मूल रूप से मार्च 2026 तक प्रभावी रहना था।

यह 30% लेवी (Levy) इस प्रकार संरचित है: 10% बुनियादी सीमा शुल्क और 20% कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC)। मोंटाना और नॉर्थ डकोटा के किसान, जो अमेरिका में इन फसलों के दो प्रमुख उत्पादक हैं, उनके लिए यह टैरिफ एक “महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान” है, जिसने प्रभावी रूप से उच्च गुणवत्ता वाले अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार से बाहर कर दिया है। भारत दालों का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो वैश्विक खपत का लगभग 27% हिस्सा है। अमेरिकी उत्पादकों के लिए भारतीय बाजार तक पहुँच केवल एक प्राथमिकता नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता है, विशेष रूप से तब जब चीन जैसे अन्य बाजार अस्थिर बने हुए हैं।

घरेलू दबाव बनाम अंतरराष्ट्रीय कूटनीति

इन शुल्कों को फिर से लागू करने का भारत का निर्णय मनमाना नहीं था। 2025 के अंत में, भारतीय सरकार को घरेलू किसान यूनियनों के भारी दबाव का सामना करना पड़ा। स्थानीय उत्पादकों का तर्क था कि रूस, कनाडा और अमेरिका से सस्ते पीली मटर के भारी आयात से स्थानीय मंडियों की कीमतें गिर रही हैं, वह भी ठीक तब जब घरेलू रबी (सर्दियों) की फसल की कटाई शुरू होने वाली थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए गणित सरल है: लगभग 10 करोड़ भारतीय किसानों की आजीविका अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक सद्भावना से अधिक महत्वपूर्ण है। यह “आत्मनिर्भर” रुख सीधे तौर पर ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” (America First) विचारधारा को दर्शाता है, जिससे एक ऐसा घर्षण बिंदु पैदा हो गया है जहाँ दो राष्ट्रवादी आर्थिक नीतियां आपस में टकरा रही हैं।

50% टैरिफ की बाधा

सीनेटरों की यह दलील ऐसे समय में आई है जब भारत-अमेरिका व्यापार संबंध अमेरिका को होने वाले कई भारतीय निर्यातों पर 50% संचयी टैरिफ के कारण पहले से ही तनावपूर्ण हैं। इस बाधा में शामिल हैं:

  • प्रतिस्पर्धा को संतुलित करने के उद्देश्य से 25% पारस्परिक टैरिफ।

  • रूस से कच्चे तेल की निरंतर खरीद को लक्षित करने वाला 25% दंड टैरिफ।

इन तनावों के बावजूद, अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक ने हाल ही में सुझाव दिया कि सौदे का रास्ता अभी भी खुला है। हालाँकि, लुटनिक का यह दावा कि सौदा इसलिए विफल हो गया क्योंकि पीएम मोदी ने इसे अंतिम रूप देने के लिए ट्रंप को “फोन नहीं किया”, नई दिल्ली में कड़ी अस्वीकृति के साथ मिला है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि वे “पारस्परिक रूप से लाभकारी” समझौते में रुचि रखते हैं, लेकिन किसी एकतरफा रियायत के लिए दबाव में नहीं आएंगे।

अमेरिकी सीनेटर केविन क्रेमर ने अपने संदेश में स्थिति की गंभीरता पर जोर दिया:

“जैसे-जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापारिक असमानताओं को संतुलित करने की ओर देख रहा है, अमेरिकी किसान उस कमी को पूरा करने के लिए तैयार हैं। यदि व्यापार के अवसर खुलते हैं, तो उनके पास दुनिया का पेट भरने की जबरदस्त क्षमता है। दलहन फसलों के टैरिफ पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ चर्चा करना अमेरिकी उत्पादकों और भारतीय उपभोक्ताओं दोनों के लिए समान रूप से फायदेमंद होगा।”

विशेषज्ञ विश्लेषण: ‘ग्रैंड बार्गेन’ (बड़ा सौदा)

व्यापार विश्लेषकों का सुझाव है कि दलहन का मुद्दा व्यापक भारत-अमेरिका व्यापार सौदे के लिए एक ‘चेतावनी संकेत’ हो सकता है। प्रमुख व्यापार विशेषज्ञ डॉ. अर्पिता मुखर्जी नोट करती हैं:

“अमेरिका पूरे व्यापार सौदे के लिए कृषि पहुँच को एक ‘लिटमस टेस्ट’ के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हालाँकि, भारत का दलहन टैरिफ केवल राजस्व के बारे में नहीं है; यह ग्रामीण राजनीतिक स्थिरता के बारे में है। इसके समाधान के लिए संभवतः एक ‘ग्रैंड बार्गेन’ की आवश्यकता होगी—शायद कम कृषि बाधाओं के बदले में अमेरिकी तेल दंड की वापसी।”

दलहन की राजनीति का इतिहास

भारत-अमेरिका कूटनीति में दलहन की फसलें लंबे समय से केंद्र बिंदु रही हैं। 2020 में, “नमस्ते ट्रंप” कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने पीएम मोदी को डेंस और क्रेमर का एक पत्र व्यक्तिगत रूप से सौंपा था। हालाँकि उसके बाद उदारीकरण की एक अवधि आई, लेकिन भारतीय मानसून की अनिश्चितता और स्थानीय चुनाव चक्र अक्सर नई दिल्ली को संरक्षणवाद की ओर लौटने के लिए मजबूर करते हैं। अमेरिका के लिए, भारतीय बाजार का नुकसान चीन द्वारा हाल ही में उत्तरी अमेरिकी मटर पर लगाए गए 100% टैरिफ से और भी गंभीर हो गया है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका के गोदाम भरे हुए हैं और कीमतें तेजी से गिर रही हैं।

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